समकालीन दलित लेखन : संवेदना और सरोकार
दलित वर्ग सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक रूप से दबा कुचला समाज का वह उपेक्षित, शोषित, पीड़ित वंचित व त्याज्य वर्ग है जिसे वर्ण व्यवस्था के अमानवीय विधान के कारण सदियों से नारकीय जीवन जीने पर विवश किया गया। सामाजिक अन्याय, अत्याचार तथा शोषण के शिकार इस वर्ग को जहां एक ओर सामाजिक दृष्टि से निकृष्ट एवं हेय माना जाता रहा वहीं आर्थिक शोषण के चलते यह वर्ग गांव के बाहर मरे हुए जानवरों का मांस खाकर जीवन यापन करने को बाध्य हुआ। दलित चेतना समाज के इसी पीड़ित तथा संत्रस्त वर्ग की विदग्ध वेदना की अभिव्यक्ति है। दलित चेतना को व्याख्यायित करते हुए ओमप्रकाश वाल्मीकि कहते हैं- ”चेतना का सीधा सम्बन्ध दृष्टि से होता है जो दलितों की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, सामाजिक भूमिका की छवि के तिलिस्म को तोड़ती है, वह है दलित चेतना। दलित मतलब मानवीय अधिकारों से वंचित, सामाजिक तौर पर जिसे नकारा गया हो। उसकी चेतना यानि दलित चेतना।“1 यह पीड़ित समुदाय की अस्मिता की वह छटपटाहट और पीड़ा है जिसमें क्षोभ, विद्रोह निषेध तथा अस्वीकार के आक्रामक तेवर हैं जो दलित साहित्यकारों की रचनाओं में अभिव्यक्ति पाकर मूर्त...