दलित-विमर्श और प्रेमचंद

  बीसवीं सदी आरम्भ से अंत तक राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक प्रत्येक स्तर पर ऊहापोह तथा संक्रमण की शताब्दी रही है। भारतीय इतिहास का यह काल-खंड अंतर्विरोधों से परिपूर्ण है, जिसने भारतवर्ष को कई समस्याएँ दीं। इस सदी में समाज के प्रत्येक क्षेत्र में परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है, जिसने एक ओर समाज को उन्नति के पथ पर अग्रसर किया तो वहीं दूसरी ओर चतुर्मुखी विघटन की विभीषिका प्रदान की। विशेषकर बीसवीं शताब्दी का अन्तिम दशक विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिवर्तनों से जूझते पीड़ित तथा शोषित भारतवासियों के अदम्य साहस तथा अदमनीय-जिजीविषा का गवाह बना। संक्रांति के इस काल में, जहाँ दलितों, वंचितों एवं स्त्रियों ने अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाई, वहीं बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद, भूमण्डलीकरण और उत्तर-आधुनिकता की चुनौतियाँ भी उभर कर सामने आईं। हिन्दी उपन्यासों ने संक्रमण की अवस्था से गुज़रते भारतीय समाज के इन समस्त संदर्भों को समेटने उन्हें आत्मसात् करने की चेष्टा की है। इन उपन्यासों में सामाजिक विसंगतियाँ, प्रशासनतंत्र, राजनीतिक, विडम्बना, सामाजिक संघर्ष, मानवीय संवदेना, मूल्यों का क्षरण, उपभोक्तावाद, संक्रमण की पीड़ा जैसे सन्दर्भ गहराई से उभरकर आए हैं। इन समस्त सन्दर्भों में विशेषरूप से नारी-विमर्श तथा दलित विमर्श उसके केन्द्र में स्थित है।
हिन्दी में दलित-विमर्श को लेकर दो धाराएँ प्रवाहमान हैं। एक धारा ऐसे लेखकों की है, जो ग़ैर-दलित होते हुए भी अपनी प्रगतिशील जनवादी सोच के तहत संवेदना के धरातल पर दलितों से जुड़े हैं। उनकी समस्त सहानुभूति सामाजिक अत्याचार, अन्याय एवं शोषण के शिकार समाज के इस उपेक्षित वर्ग के साथ है। अपने लेखन के द्वारा वे दलित चेतना का खुलकर समर्थन करते हैं। दूसरी धारा उन दलित लेखकों की है, जिन्होंने दलित परिवार में जन्म लेने के कारण अपमान तथा तिरस्कार के कड़वे घूँट पिये हैं। कदम-कदम पर प्रताड़ना सहन की है। इस प्रकार दलित साहित्य के अन्तर्गत स्वानुभूति बनाम सहानुभूति इस समय हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक बहस का मुद्दा बना हुआ है। हमारे यहाँ आज चहुँओर जिस दलित विमर्श का शंखनाद हो रहा है, यदि हम हिन्दी साहित्य के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि दलित विमर्श अथवा दलित साहित्य को लेकर आत्मानुभूति बनाम सहानुभूति का जो द्वन्द्व चल रहा है, उस दलित-विमर्श की सबसे पहली अनुगूँज हमें प्रेमचन्द साहित्य में सुनाई देती है। दलित समाज को साहित्य के केन्द्र में लाने वाले प्रेमचंद हिन्दी-साहित्य के वह प्रथम रचनाकार हैं, जिन्होंने उस समय दलित जीवन की विसंगतियों तथा नारकीय जीवन की स्थितियों को अपने कथा-साहित्य में उजागर किया, जब समाज से बहिष्कृत दलित समुदाय की भाँति दलित साहित्य आन्दोलन भी हाशिए पर पड़ा था।
दलित-साहित्य की रचना कौन कर सकता है? इस प्रश्न को लेकर चलने वाली गरमा-गरम बहस में अनेक साहित्यकारों ने इसके पक्ष तथा विपक्ष में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है इस प्रश्न के उत्तर में सबके अपने-अपने तर्क हैं। दलित-साहित्य को स्वानुभूति का साहित्य मानने वाले मैनेजर पाण्डेय का कथन है ”जहाँ तक दलित साहित्य की अवधारणा की बात है, तो दलित साहित्य दो रूपों में देखा जा सकता है। एक तो दलितों के द्वारा दलितों के बारे में दलितों के लिए लिखा गया साहित्य और दूसरा दलितों के बारे में ग़ैर-दलितों द्वारा लिखा गया साहित्य। मेरे विचार में करुणा और सहानुभूति के सहारे ग़ैर दलित लेखक भी दलितों के बारे में अच्छा साहित्य लिख सकते हैं। लेकिन सच्चा दलित साहित्य वही है, जो दलितों द्वारा अपने बारे में या सवर्ण समुदाय के बारे में लिखा जाता है, क्योंकि ऐसा साहित्य सहानुभूति या करुणा से नहीं, बल्कि स्वानुभूति से उपजा होता है।“1 जबकि इसके विपरीत श्री लाल शुक्ल ”मेरे साक्षात्कार“ में लिखते हैं ”यदि अच्छे साहित्य का मूलाधार प्रत्यक्ष अनुभव ही माना जाय तो आप इससे सहमत हो सकते हैं। मगर प्रत्यक्ष अनुभव की भी अनेक सीमाएँ हैं। हो सकता है कि मैं अपनी बाल्यावस्था में विशेष प्रकार के अनुभवों से गुज़रा होऊँ, लेकिन बीस वर्ष बाद वे केवल पूर्ववर्ती स्मृतिमात्र रह जायँ। प्रत्यक्ष अनुभव की जो प्रखरता होनी चाहिए, वह न रहे, या उनमें अत्युक्ति की विकृति आ जाय। दरअसल रचना में अनुभव की प्रत्यक्षता अनिवार्य नहीं है, इसलिए यह असम्भव नहीं है कि जो चीज़ एक दलित लेखक अपने अनुभव के सहारे आपके सम्मुख प्रस्तुत करना चाहता है, उसे दूसरे समुदाय का कोई लेखक उससे ज़्यादा प्रखर, ज़्यादा विचलित करने वाले ढंग से अपने परोक्ष अनुभव पर प्रखर संवेदना के आधार पर प्रस्तुत कर दे।“2
परन्तु साहित्य को इस प्रकार दलित या ग़ैर दलित की सीमा में बाँधना कदापि उचित नहीं क्योंकि साहित्य किसी एक व्यक्ति, वर्ण जाति वर्ग, समुदाय अथवा सम्प्रदाय तक सीमित नहीं है अपितु वह एक सार्वभौम शाश्वत रचना प्रक्रिया है जो सर्व आयामी और सर्वस्पर्शी है। इसलिए साहित्य को इस प्रकार विभाजित करके देखना उसके अर्थ, प्रभाव, प्रयोजन और प्रयोग क्षेत्र को सीमित, संक्षिप्त, एकांगी और संकीर्ण बना देता है। मानव-जीवन साहित्य की धुरी है और उसका कथ्य भी। शोषण करने वाला भी मनुष्य है और शोषित भी मनुष्य ही है। इस आधार पर साहित्य न तो शोषक हो सकता है और न शोषित, साहित्य केवल साहित्य है वह न तो दलक हो सकता है और न दलित, साहित्य सदैव साहित्य ही रहेगा। दलित शब्द को जातिबद्ध और वर्गबद्ध करने वाले महानुभाव साहित्य को ख़ेमों में बाँटकर उसे सीमाबद्ध करना चाहते हैं। ”इन मसलों पर एक बार फिर सिलसिलेवार विचार करने की ज़रूरत है। यह ज़रूरत सर्वोपरि तौर पर इसलिए है कि दलित मुक्ति के प्रश्न पर सिर्फ़ दलितों का सर्वाधिकार सुरक्षित नहीं हो सकता, क्योंकि यह समूची पीड़ित, शोषित भारतीय जनता की मुक्ति का एक बुनियादी और अनिवार्य प्रश्न है।“3 दलित जीवन और दलित समुदाय को केन्द्र बनाकर साहित्य रचना करने वाला साहित्यकार किस वर्ग सम्प्रदाय अथवा समुदाय का है यह प्रश्न इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना यह कि उस रचनाकार में कितनी प्रतिभा, सर्जनशीलता है और उसका प्रगतिशील रचना में कितना योगदान है। ”स्वानुभूति की प्रमाणिकता तभी हो सकती है, जब भोक्ता भोगी गई घटनाओं के वस्तुपरक विश्लेषण में सक्षम हो और यह तब तक नहीं हो सकता जब तक कि उक्त घटना की मूलकारक सामाजिक प्रक्रिया को समझ पाने में सक्षम वैज्ञानिक ऐतिहासिक जीवन दृष्टि और पद्धति भोक्ता के पास न हो।“4
दलित साहित्य के दावेदार तथाकथित दलित लेखकों पर प्रेमचंद को गै़र दलित स्वीकार करते हुए उनके दलित लेखन को सिरे से ख़ारिज करने की धुन सवार है। इन दलित लेखकों के मतानुसार प्रेमचंद ने अपने कथा-साहित्य में दलित पात्रों के प्रति मात्र करुणा या दया ही प्रदर्शित की है। उनका साहित्य एक गै़र-दलित द्वारा लिखा गया सहानुभूति का साहित्य है। अतः वह दलित साहित्य की परिधि में नहीं आता। ”कई दलित लेखक दलित जीवन विषयक प्रेमचंद के लेखन की आलोचना इस आधार पर करते हैं कि अपने राजनीतिक-सामाजिक विचारों में प्रेमचंद गाँधीवादी थे न कि अम्बेडकरवादी इसलिए वे दलित जीवन के यथार्थ के वास्तविक चित्रण में सर्वथा अक्षम थे यह अपने आप में एक प्रत्यक्षवादी दार्शनिक तर्क है यदि ऐसा होता तो विचारों में राजतन्त्रवादी बाल्ज़ाक पूँजीवादी समाज की निर्मम आलोचना के साथ ही, अपनी कृतियों में, अपने प्रिय अभिजातों के पतन की अपरिहार्यता को चित्रित नहीं कर पाते, न ही वह अपने कटुतम राजनीतिक विरोधी जनतन्त्रवादी पात्रों को जनसाधारण के वास्तविक नायकों के रूप में प्रस्तुत कर पाते।“5 पूर्वाग्रह से ग्रसित यह दलित लेखक इस सत्य को कैसे नकार सकते हैं कि प्रेमचंद ने अपने कथा साहित्य में दलित जीवन को उस समय वाणी प्रदान की जब उनका पक्ष लेने वाले उन पर लिखने वालों का अकाल था। दलितों के प्रति प्रेमचंद का लगाव कोरी सहानुभूति नहीं अपितु उन्हें सामाजिक न्याय दिलाने की वह आकांक्षा है जिसे वह किसी भी क़ीमत पर पूर्ण करना चाहते हैं।
सामाजिक अन्याय रूपी विष का पान करने वाले दलित वर्ग के प्रति प्रेमचंद केवल सहानुभूति के आँसू नहीं बहाते अपितु उनकी यह सहानुभूति इस वर्ग के स्वाभिमान के संघर्ष में एक धारदार हथियार का काम करती है यदि ऐसा न होता तो वह ‘कफ़न’, ‘मंदिर’, ‘सद्गति’ और ‘ठाकुर का कुआँ’ जैसी कहानियाँ तथा ‘कर्मभूमि’, रंगभूमि’ एवं गोदान जैसे उपन्यास की रचना कभी न कर पाते। भारत के राष्ट्रीय संघर्ष के प्रतिनिधि-प्रतीक के रूप में दलित व स्त्री चरित्र को सबसे सशक्त एवं प्रभावशाली रूप में स्थापित करने वाले उपन्यास ‘रंगभूमि’ में प्रेमचंद द्वारा दलितों के लिए चमार शब्द का प्रयोग किये जाने से उसे दलित विरोधी घोषित करते हुए दलित अकादमी के कार्यकर्ताओं ने उसे आग के हवाले कर दिया। जबकि ‘‘रंगभूमि’’ में- ”सूरदास का जैसा रौशन किरदार प्रेमचंद ने पेश किया है, उसे अगर जातिगत शब्दावली में भी देखना हो तो यही कहा जाएगा कि सूरदास ऐसा चमार है। जिससे बड़े से बड़े पण्डित या ब्राह्यण केवल हसद कर सकते हैं; उसे हासिल नहीं कर सकते।“6 सूरदास की भाँति उनके कई दलित पात्र ऐसे हैं जो जीवन संघर्ष में बार-बार पराजित होने पर भी हार नहीं मानते।
‘प्रेमचंद कथा साहित्य’ में चित्रित दलित जीवन की जटिलताएँ धार्मिक तथा सांस्कृतिक से अधिक आर्थिक स्थितियों से सम्बन्ध रखती हैं। धर्म को तो वह दलित वर्ग का शोषण करने वाले हथियार के रूप में देखते हैं। धर्मांतरण या मंदिर प्रवेश को वह दलितों की समस्या का स्थायी समाधान नहीं मानते इसी कारण कर्मभूमि में अछूतों के सामाजिक जीवन में स्वीकृति के सवाल पर प्रेमचंद गांधी जी से प्रभावित अवश्य दिखाई देते हैं परन्तु मंदिर प्रवेश जैसे आंशिक सुधारवाद से वह संतुष्ट नज़र नहीं आते वे गांधी जी की भाँति दलितों की समस्या के आर्थिक पक्ष की अवहेलना नहीं करते अपितु इस मुद्दे पर वह जनसंघर्ष के समर्थन का पक्षग्रहण करते हैं। अछूतों की सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति में आमूल चूल परिवर्तन की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए उनके शैक्षिक और सांस्कृतिक विकास को भी महत्व प्रदान करते हैं।
दलित जीवन के भयावह यथार्थ को चित्रित करते समय प्रेमचंद दलितों की दुर्दशा के लिए उत्तरदायी वर्ण व्यवस्था को श्रम के मूल्य का शोषण करने वाली व्यवस्था के रूप में रेखांकित करना नहीं भूलते। गोदान में मातादीन और सिलिया के प्रसंग के माध्यम से प्रेमचंद वर्ण व्यवस्था के दो विपरीत ध्रुवों से पाठक का साक्षात्कार कराते हैं जिसके एक ओर ब्राह्यण हैं तो दूसरी ओर चमार मातादीन और सिलिया की उपकथा के द्वारा प्रेमचंद दलितों की समस्या को रेखांकित करते हुए जहाँ एक ओर ब्राह्यण वर्ग के धार्मिक पाखण्ड को उजागर करते हैं।7 वहीं सिलिया के माता-पिता के विद्रोही तेवर के द्वारा दलितों में उत्पन्न होने वाली चेतना को भी इंगित करते हैं। इस प्रकार गोदान में मातादीन और सिलिया का प्रसंग उनके पाखण्ड, खण्डन तथा उत्पीड़ित एवं उपेक्षित वर्ग के पक्ष में खड़े होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है। दलित जीवन की सामाजिक तथा आर्थिक स्थितियों का चित्रण करते हुए प्रेमचंद वर्ण या धर्म व्यवस्था के परिवर्तन की नहीं अपितु उसके समापन की बात करते हैं।
दलितों के प्रति प्रेमचंद की सहानुभूति का आधार केवल दयाभाव नहीं प्रेमचंद के साहित्य में दलित नहीं वरन् दलित समस्या है। दयाभाव के द्वारा समस्या और उसके निदान की बात नहीं की जाती बल्कि उसे बनाए रखने का प्रयत्न होता है जो प्रेमचंद के साहित्य में कहीं दिखाई नहीं देता। दलितों की समस्या को प्रेमचंद सारे राष्ट्र की समस्या मानते हुए उसके निदान हेतु पूरी तरह दलितों के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। भारत के ग्रामीण परिवेश में जाति-व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था की रूपरेखा प्रस्तुत करते समय दलित समाज की नारकीय दशा को स्पष्ट करते हुए प्रेमचंद अपनी ओर से कुछ नहीं कहते वरन् उनके पात्र इस बात की गवाही अवश्य देते हैं कि उनकी पक्षधरता समाज के किस वर्ग के साथ हैं। ‘कफ़न, मंदिर, सद्गति, और ठाकुर का कुआँ जैसी कहानियाँ तथा ‘कर्मभूमि’, ‘रंगभूमि’ तथा ‘गोदान’ जैसे उपन्यास इसके महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। प्रेमचंद की यह कृतियाँ स्वानुभूति बनाम सहानुभूति के मुद्दे पर अपने मुक़ददमे की पैरवी स्वयं करते हुए दलित साहित्य में समर्थ उपस्थिति दर्ज कराते हुए अपनी मज़बूत दावेदारी सिद्ध करती हैं।

सन्दर्भ


1.    मैनेजर पाण्डेय, लोकमत और दलित साहित्य पृ0 52

2.    ‘दलित साहित्य की अवधारणा और प्रेमचंद, सं0 सदानंद शाही प्रेमचंद साहित्य संस्थान, गोरखपुर, प्रथम संस्करण 2000 पृ0 सं0 56
3.    समकालीन साहित्य समाचार, पृ0 21
4.    प्रेमचंद के आयाम, ए. अरविंदाक्षन, पृ0 186
5.    वही पृ0 190
6.     वही पृ0 187-188
7.    वर्तमान साहित्य जुलाई 2005 पृ0 77
8.    प्रेमचंद गोदान, लोकभारती प्रकाशन इला0 पृ0 107
9.    वही पृ0 214
डाॅ0 जूही बेगम
उर्दू विभाग, 
इलाहाबाद डिग्री काॅलेज, इलाहाबाद

تبصرے

مقبول عام

مقدمہ شعر و شاعری : ایک تجزیہ

تنقید کی تعریف اور اہمیت

شمالی ہند میں اردو کا ارتقا