रशीद जहाँ की नारी चेतना
भारतीय साहित्य में स्त्री विमर्श का जो स्वरूप आज हमें दिखाई देता है वह अपने भीतर वैचारिकता और आन्दोलनों की एक गहन पृष्ठभूमि रखता है। यह एक ऐसा अंतहीन संघर्ष है, ऐसा मानसिक, सामाजिक आलोड़न है जो सदियों से मात्र भोग्या समझी जाने वाली शोषित, वंचित नारी के मन में अपनी खोई हुई अस्मिता की प्राप्ति और मुक्ति की कामना के रूप में हमेशा पलता रहा। उन्नीसवीं सदी के अन्त तक आते-आते जब रूढ़ परम्पराओं और विचारों के बंधन टूटने की प्रक्रिया ने ज़ोर पकड़ा तो महिलाओं के जीवन और चेतना में महत्वपूर्ण परिवर्तन आए। स्त्रियों ने अपनी इस वैचारिक चेतना का सम्बन्ध साहित्य से जोड़ा और उन्हें रचनात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करने की ओर उन्मुख र्हुइं यदि उर्दू साहित्य में महिला लेखन की बात करें तो उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त से ही उनकी रचनाओं में स्त्री विमर्श की सुगबुगाहट सुनाई देने लगती है और बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक तक आते-आते स्त्री विमर्श का यह स्वर ज़ोर पकड़ता जाता है इस समय महिला लेखन के सन्दर्भ में एक नाम जो उभर कर सामने आता है वह रशीद जहाँ का है जिन्हें उर्दू साहित्य में नारी स्वतंत्रता की मांग को सबसे सशक्त ढंग से उठाने वाली प्रथम लेखिका समझा जाता है।
रशीद जहाँ ने अपनी पहली कहानी ज्वउ ज्वउ ठमंजे शीर्षक से 1922 ई0 में अपनी काॅलेज मैग्जीन के लिए लिखी थी जिसका उर्दू अनुवाद आले अहमद सुरूर ने सलमा के नाम से किया जो बाद में उनके कहानी संग्रह शोले जैव्वाला में सम्मिलित हुई। रशीद जहाँ की इस पहली रचना से ही जो उन्होनें ने विद्यार्थी जीवन में लिखी थी उनकी क्रांतिकारी सोच और विद्रोही प्रवृत्ति के संकेत मिलने लगते हैं। अपनी इस कहानी में उन्होंने मध्यवर्गीय परिवारों में शादी के नाम पर लड़कियों के साथ होने वाली ज़बर्दस्ती और ज़्यादतियों को रेखांकित किया है।
रशीद जहाँ उर्दू की एक ऐसी रचनाकार हैं जिनके नाम के बिना प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापकों की सूची अपूर्ण रहेगी। साहित्य जगत में रशीद जहाँ का विधिवत् पर्दापण 1932 ई0 में प्रकाशित होने वाले कहानी संग्रह “अंगारे” से होता है। इस संग्रह में सज्जाद ज़हीर की पाँच कहानियाँ “नींद नहीं आती“, “जन्नत की बशारत”, “गर्मियों की एक रात”, “दुलारी”, “फिर यह हंगामा”, “अहमद अली की दो कहानियाँ”, “बादल नहीं आते”, “महावटों की एक रात”, “ महमूदुज़्ज़फ़र की एक कहानी”, “जवां मर्दी”, “रशीद जहाँ की एक कहानी”, “दिल्ली की सैर”, और “एक नाटक पर्दे के पीछे” सम्मिलित थे। अंगारे की इन समस्त रचनाओं में रचनाकारों ने तद्युगीन समाज के ज्वलन्त मुद्दों को निर्भीकता पूर्वक अभिव्यक्ति प्रदान की। सामाजिक जकड़ बन्दियों, अंधविश्वासों, यौन शोषण, तथा नारी की विवश्ता तथा सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक व्यवस्था की चुनौती देने वाले इस संग्रह को ब्रिटिश सरकार ने अश्लील घोषित करते हुए ज़ब्त कर लिया।
“दिल्ली की सैर” और “पर्दे के पीछे” पुरुष प्रधान समाज में नारी की स्थिति का यथार्थ मूल्यांकन करने वाली रशीद जहाँ की ऐसी रचनाएं हैं जिसमें उन्होंने नारी को अपनी मिल्कियत समझने वाले पुरुषों की दूषित मानसिकता, पुरुष समाज के अहंकार, स्वार्थपरता और असंवेदनहीनता को बड़ी निर्भीकता से रेखांकित किया जिसके लिए उन्हें समाज के तथा कथित ठेकेदारों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। अंगारे का विरोध करने वालों ने सबसे अधिक रशीद जहाँ की निन्दा और आलोचना का निशाना बनाया क्योंकि यह पहला मौक़ा था जब किसी मुस्लिम महिला ने पुरुष सत्ता को चुनौती देते हुए नारी समस्याओं को इतनी बेबाकी से अपनी रचनाओं में प्रस्तुत किया था। डा0 अली जावेद के कथनानुसार-
“अभी तक महिलाएं शिष्टाचार सिखाने से आगे की बात नहीं सोच सकती थीं। इसके विपरीत मर्द को हर तरह की स्वतंत्रता प्राप्त थी और वह भी यदि उसका सम्बन्ध कुलीनों के वर्ग से है इसीलिए मस्जिदों में अंगारे के खि़लाफ जो सभाएं हुईं उनका सबसे बड़ा निशाना रशीद जहाँ थीं क्योंकि स्त्री आने वाली पीढ़ियों के विचारों में क्रान्ति बर्पा कर सकती थी। वह सदियों से घर की चहारदीवारी में कै़द औरत को विद्रोह का निमंत्रण दे सकती थी। रशीद जहाँ ने उन्हें अपने अधिकारों का एहसास दिलाया और उन्हें प्राप्त करने के लिए समस्याओं का हल स्वयं खोजने के लिए उकसाया और विद्रोह पर आमादा किया था। उनके पात्र बीवी की हैसियत से शौहर की गुलामी करने को तैयार नही बल्कि अपने अस्तित्व का एहसास दिलाते हैं जो उस समाज के ठेकेदारों की परेशानी का कारण थे।”1
यह सच है कि अंगारे के समस्त रचनाकारों में रशीद जहाँ को सबसे अधिक विरोध और आलोचना झेलनी पड़ी परन्तु इस संग्रह ने उर्दू साहित्य में उन्हें एक पहचान दी। प्रगतिशील विचारों वाले पढ़े लिखे लोगों तथा साहित्यकारों ने उनकी रचनाओं का खुले मन से स्वागत किया। इस संग्रह ने रशीद जहाँ को नारी मुक्ति के लिए आवाज़ उठाने वाली क्रांतिकारी रचनाकार के रूप में स्थापित किया।
“दिल्ली की सैर” एक छोटी सी घटना पर आधारित कहानी है जिसमें एक युवा दंपत्ति दिल्ली की सैर के लिए जाते हैं पति सामान की देखभाल के लिए पत्नी को प्लेटफ़ार्म पर छोड़कर अपने दोस्तों संग सैर सपाटे को निकल जाता है। इधर पत्नी भूखी प्यासी प्लेटफ़ार्म पर अकेली बैठी रहती है पति की इस लापरवाही से वह इतनी क्षुब्ध होती है कि दिल्ली की सैर करने से इन्कार कर देती है। रशीद जहाँ ने इस छोटी सी कहानी में भारतीय नारी के पूरे संसार को जज़्ब कर दिया है। उन्होंने नारी को घर की चहारदीवारी में क़ैद करके रखने वाले पुरुषों की उस मानसिकता को उजागर किया है जो औरत को मर्द की इच्छाओं का ग़ुलाम समझती है। विषय की दृष्टि से नयापन होने के कारण यह कहानी अपने आप में महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें दबदबा सा ही सही, नारी का प्रतिरोध ज़रूर विद्यमान है। दो घंटे के बाद मलिका बेगम (कहानी की नायिका) का पति जब खा पीकर वापस स्टेशन पहुंचता है और उससे पूछता है “भूक लगी हो तो कुछ पूरियां वूरियां ला दूं? खाओगी? मैं तो उधर होटल में खा आया।”
इस पर मलिका बेगम का यह उत्तर-
“मैंने कहा, ख़ुदा के लिए मुझे मेरे घर पहुँचा दो। मैं बाज़ आई इस मुई दिल्ली की सैर से तुम्हारे साथ तो कोई जन्नत में भी न जाए।”2 पाठक को सोचने पर विवश कर देता है।
पर्दे के पीछे घरेलू पृष्ठभूमि पर आधारित एक एक्ट का नाटक है। आफ़ताब बेगम और मुहम्मदी बेगम इस नाटक के दो मुख्य पात्र हैं। रशीद जहाँ ने इन दोनो नारी पात्रों के पारस्परिक संवादों के द्वारा बज़ाहिर स्वस्थ दिखाई देने वाली पुरुष प्रधान समाज व्यवस्था के “पर्दे के पीछे” की उस सच्चाई से रूबरू कराया है जहाँ स्त्री को केवल एक सेक्स आब्जेक्ट समझा जाता है। पुरुष तंत्र अपनी तृप्ति के लिए उसका किस-किस प्रकार शोषण करता है नाटक में नारी मन की अथाह गहराई में उतर कर रशीद जहाँ ने नारी जीवन की विवशता और पुरुष के अत्याचार और उसकी कामुक्ता को निडरता से बेनक़ाब किया है।
रशीद जहाँ ने उर्दू साहित्य को समाज के रूमान के धुंधलकों से निकालकर समाजवाद के एक नए रूझान से अवगत कराया। उन्होंने प्रेमचंद की सामाजिक यथार्थवाद की परम्परा को न केवल आगे बढ़ाया अपितु अपनी अधिकतर रचनाओं में इस परम्परा का निर्वाह करके उसे दृढ़ता प्रदान की प्रोफ़ेसर क़मर रईस के मतानुसार-
“प्रगतिशील साहित्यकारों में रशीद जहाँ अकले थीं जिन्होंने उर्दू कहानियों में सामाजिक और क्रांतिकारी यथार्थवादी लेखन की परम्परा को सुदृढ़ बनाने की चेष्टा की। उर्दू में पहली बार एक क्रांतिकारी और वैज्ञानिक सोच रखने वाली महिला के जीवन को उस ऐतिहासिक और भौतिक कारकों के परिप्रेक्ष्य में देखा। इसलिए उनकी दृष्टि उन पहलुओं पर गई जिन पर न केवल पुरुष वरन महिला कहानीकार की पहुँच भी नहीं हो सकती थी।3
इस कथन के आलोक में उनकी कई कहानियों उदाहरणार्थ ‘आसिफ़ जहाँ की बहू’, ‘मेरा एक सफ़र’, ‘वह, इफ़्तारी’, ‘सास और बहू’, मुजरिम कौन’, ‘छेद्दा की मां’ और ‘सौदा’ के नाम लिए जा सकते हैं।
रशीद जहाँ ने जिस समय लिखना आरम्भ किया उस समय पूरा देश सामाजिक राजनीतिक तथा सांस्कृतिक एवं वैचारिक स्तर पर क्रांतिकारी संघर्ष से दो चार था। इन परिस्थितियों में राजनीतिक तथा सामाजिक चेतना सम्पन्न खुले विचारों वाली रशीद जहाँ की सोच को माक्र्सवादी तथा साम्यवादी विचारों ने और अधिक परिपक्वता प्रदान की, और उनके मन में देश और दुनिया को बदलने की भावना और भी प्रबल हो गई जिसने उन्हें हर प्रकार की अंध परम्पराओं शोषण और अत्याचार के विरूद्ध लिखने पर विवश किया। पितृ सत्तात्मक समाज में पुरुष की निरंकुशता, नारी की विवशता, मुस्लिम औरतों की पारिवारिक घुटन, धर्म की आड़ में पुरुषों द्वारा नारी की स्वतंत्रता उसके अधिकारों का हनन दांपत्य जीवन में पति के अत्याचार उसकी ज़ोर ज़बरदस्ती इन तमाम विसंगतियों से स्त्री को आज़ादी दिलाने के लिए उन्होंने पुरुषवादी शोषणकारी समाज व्यवस्था के खि़लाफ बाक़ायदा एक साहित्यिक मोर्चा खोला।
रशीद जहाँ के यहाँ औरत मर्द की मुहताज नहीं और न ही उसकी ग़ुलाम है उनके नारी पात्र कमजोर नहीं, वह दबकर घुटकर नहीं जीते, न ही पुरुष के अत्याचार चुपचाप सहन करने के आदी हैं वरन् वे उसका सक्रीय प्रतिरोध करते हैं। 1937 ई0 में लाहौर से प्रकाशित उनके पहले संग्रह “औरत और दूसरे अफ़साने” में सम्मिलित एक एक्ट का नाटक ‘औरत’ उनकी एक ऐसी ही रचना है। इसके पात्र अतीक़ उल्लाह के बच्चे जीवित नहीं रह पाते जिसके लिए वह अपनी पत्नी को उत्तरदायी मानते हुए दूसरी शादी करना चाहता है जबकि पत्नी उसे ही इसका ज़िम्मेदार ठहराती हैं क्योंकि अतीक़ उल्लाह स्वयं रोग से ग्रसित है। क्रोध में आकर जब अपनी पत्नी पर वार करने की कोशिश करता है तो वह चेतावनी देती हुई कहती है कि इस बार मुझे मारा तो अच्छा नहीं होगा। बीवी के तेवर देख कर अतीक़ उल्लाह दुबक कर बैठ जाता है।
रशीद जहाँ की कहानियों में नारी अधिकारों के प्रति जागरुकता की भावना सर्वत्र दिखाई पड़ती है। इसी कारण उनके नारी पात्र अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए कुछ भी कर गुज़रने को तैयार हैं। कहानी- “छेद्दा की माँ” में छेद्दा की तीसरी बीवी में अपने अधिकारों के प्रति इसी जागरुकता के दर्शन होते हैं जो अपनी सास के अत्याचार और शोषण के विरूद्ध आवाज़ उठाती हैः एक उदाहरण दृष्टव्य हैः
“बुढ़िया ने अपनी वही हरकतें शुरू की थीं लेकिन यह लड़की बुढ़िया के जोड़ की है। एक दिन पकड़कर सास की वह मरम्मत की कि सब बहुओं का बदला निकाल लिया और कहने लगी “मैं यह देली छोड़कर नाय जाऊंगी। वह और ही रही होंगी जो न जाने किसकी ... बेटियां थीं जो चली गईं, जो तुझे इस घर में रहना है तो ठीक से रह वरना जा अपना रास्ता पकड़।4
रशीद जहाँ औरत की शिक्षा दीक्षा के साथ आर्थिक रूप से उसकी आत्मनिर्भरता की भी समर्थक थीं ताकि वह पुरुषों के शोषण का डटकर मुक़ाबला कर सके और अपनी समस्याओं का स्वयं समाधान करने में सक्षम हो। नारी की अस्मिता उसके आत्म सम्मान की रक्षा रशीद जहाँ के जीवन का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य था। जिसकी प्राप्ति के लिए वह जीवन पर्यन्त प्रयासरत रहीं। गोशए आफ़ियत, सड़क, वह, सिफ़र, नफ़रत, आसिफ़ जहाँ की बहू इत्यादि ऐसी रचनाएं हैं जिनमें उन्होंने नारी जीवन से जुड़ी समस्याओं के कई ऐसे पहलुओं को अभिव्यक्ति प्रदान की जो साहित्य जगत में अछूते थे। नारी शोषण पर आधारित कहानी “सौदा” में उन्होंने देह व्यापार के घृणित कारोबार को उस समय जिस निर्भीकता से प्रस्तुत किया वह उस युग के परिपे्रक्ष्य में रशीद जहाँ का एक बेमिसाल साहसिक कारनामा है।
प्रगतिशील आन्दोलन से सम्बद्ध रचनाकारों में रशीद जहाँ एक ऐसी बेख़ौफ़ रचनाकार हैं जिन्हें यदि फैमिनिज़्म की सबसे बड़ी प्रचारक कहा जाए तो ग़लत न होग वह उर्दू की पहली ऐसी रचनाकार हैं जिन्होंने विधिवत रूप से एक घोषणा पत्र के द्वारा मध्यवर्गीय नारी की बदहाली को स्पष्ट किया उन्होंने नारी मुक्ति के संघर्ष को एक आन्दोलन का रूप दिया जिसकी वह स्वयं ध्वजवाहक थीं।
सन्दर्भ
1. ‘बीसवीं सदी में ख़वातीन उर्दू अदब’ में सम्मिलित ‘रशीद जहाँ एक रेडिकल आवाज़’ पृ0 352 से उद्धृत
2. पत्रिका ‘ख़ातून’, अलीगढ़, नवम्बर 2005 पृ0 51
3. ‘वह और दूसरे अफ़साने, ड्रामे’ पृ0 24-25
4. वह और दूसरे अफ़साने, पृ0 69
इलाहाबाद डिग्री काॅलेज, इलाहाबाद
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